Saturday, June 14, 2008

माया का चक्कर सबको भरमाता


बह रही है भ्रष्टाचार की गंगा। सभी हाथ धो रहे हैं। कोई ज्यादा कोई कम। पुलिस उसमें डूबी है। उसी में रमी है। सबको मालूम है। पता है। जन्नत की हकीकत। कौन बोले। कौन मुंह खोले। बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। बांधना मुश्किल है। बंध जाए तो सवाल होगा- बिल्ली किसकी है। कहा जाएगा- मेरी बिल्ली, मुझसे म्याऊं। बात इतनी नहीं है कि पैसे कौन ले रहा है। ये भी है कि देता कौन है। लेन-देन में दोनों दोषी। माया का चक्कर है। सबको भरमाता है। बचे सो उतरहिं पार।

2 comments:

Amit K. Sagar said...

उम्दा. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर

आशीष कुमार 'अंशु' said...

बढ़िया पोस्ट